“मैं एक चोर हूँ” – कहानी दयाशंकर चौधरी⇒ लखनऊ के आलम बाग के एक मोहल्ले में अमावस की एक रात, एक चोर, चोरी करने के इरादे से घूम रहा था। सभी ओर बिजली की रोशनी से जगमगाहट थी। घरों में लोग जाग रहे थे। कहीं बात-चीत हो रही थी, तो कहीं टी. वी. चल रहा था।
कहीं कोई अपनी गाड़ियों से आ रहा था, कहीं कोई जा रहा था।काफी भटकने के बाद भी किसी घर में घुस कर हाथ साफ करने का मौका नहीं मिल रहा था। चोर बहुत निराश था। मन ही मन उसने इस मोहल्ले में चोरी करने का इरादा त्याग दिया और किसी दूसरे मोहल्ले की ओर जाने की सोचने लगा।
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अचानक उसकी नजर एक घुप्प अंधेरे में घर की ओर पड़ी। उसने सोचा शायद इस घर में सभी लोग सो चुके हैं। मौका बढ़िया है। थोड़ी सी होशियारी यदि दिखाई जाए तो काम बन सकता है। वह दबे पाँव उस घर की ओर बढ़ा। चुपके से बिना आवाज़ किये बाउंडरीवाल लाँघ गया। धीरे-धीरे घर के दरवाजे की ओर बढ़ा, घर के दरवाजे पर हाथ रखते ही उसे लगा कि दरवाजा अंदर से बंद नहीं था।धीरे से दरवाजा धकेलते हुए वह अंदर घुसा।
उसने महसूस किया कि उस घर में कोई नहीं है। जेब से एक छोटी सी टार्च निकाली, कमरे के चारों ओर टार्च की मध्यम रोशनी उसने घुमाई, कमरे में कहीं कोई नहीं था, कोई सामान भी नहीं था। उसने दूसरे कमरे की ओर रुख किया। ये कमरा भी पूरी तरह खाली पड़ा था। वह बहुत निराश हो गया था। चलते-चलते उसने इस मकान के तीसरे और आखिरी कमरे को भी देख लेने का मन बनाया।
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उसने कमरे में घुसते ही एक कोने में मोमबत्ती की मध्यम रोशनी में एक बूढ़े, जर्जर और कमजोर से आदमी को देखा। वह उसकी ओर बढ़ गया। पास पहुँचने पर उस बूढ़े ने भी इस चोर की ओर नज़रें उठा कर एक पल के लिए देखा, फिर अपने काम में व्यस्त हो गया। वह बुजुर्ग एक लकड़ी जैसी सूखी ‘ रोटी ‘ को पोपले मुँह के मसूड़े से काटने की कोशिश कर रहे थे। रोटी कट नहीं रही थी। वे बहुत निराश थे, शायद बेहद भूखे भी। चोर से रहा नहीं गया, उसने पूछा “बाबा आप कौन हैं, और इस अँधेरे घर में क्या कर रहे हैं।”
बुजुर्ग ने उत्तर दिया ” बेटा, मैं एक चोर हूँ, शरीर में जब तक जान थी, जब तक ताकत थी तब तक मैं चोरियाँ करता रहा, लोगों को लूटता रहा। खूब धन कमाया। खूब ऐय्यासियाँ करता रहा। मेरी पत्नी असमय ही मर गयी। मुझे शराब की लत लग गयी।” अब तक बुजुर्ग की आँखों से आँसू बहने लगे थे। उसने बताया कि शराब की लत के कारण वह कमजोर हो गये थे।
कई बीमारियों ने भी आ घेरा था। जिंदगी में कोई काम तो कभी सीखा नहीं था। चोरियाँ करने के अलावा कभी कोई काम भी नहीं किया था। सो, सारी जमा पूँजी खाने में और पीने में खर्च करने लगे। बाद में जब कुछ नहीं बचा तो एक- एक कर घर का सारा सामान बेच डाला। अब उनके पास कुछ नहीं बचा।
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उन्होने कहा- “भूख से बेहाल हूँ बेटा, चल- फिर नहीं सकता। काफी कोशिश के बाद इसी घर में कई दिनों से सूख रही एक रोटी मिल पाई है, इसे खाने की कोशिश कर रहा हूँ, मसूड़े छिल चुके हैं, रोटी कट नहीं रही है।” उन्होने कहा, “खैर छोड़ो, तुम कौन हो बेटा, और इतनी रात गये इस अँधेरे सूनसान घर में क्या करने आये हो।” चोर ने जवाब दिया,
चोर की आँखें भर आईं, उसने कहा- नहीं बाबा मैं आपकी रोटी नहीं ले सकता। उसने अपनी जेब से कुछ रुपये निकाले और उस बुजुर्ग को देना चाहा। लेकिन उस बुजुर्ग ने उन रुपयों को लेने से इंकार करते हुए कहा – ” अगर कुछ देना ही चाहते हो, तो अपना साथ दे दो, क्यों कि लोग मुझसे नफरत करते है, कोई मुझसे बात तक करना नहीं चाहता है, तुम रोज मुझसे मिलने आया करो, मुझे तुमसे बात करके सुकून हासिल होता रहेगा।
चोर का हुआ ह्रदय परिवर्तन
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चोर ने इसे स्वीकार करते हुए कहा-हाँ बाबा अब मैं रोज तुमसे मिलने आया करूँगा और चोरी जैसे काम को छोड़ कर मेहनत मजदूरी करूंगा और अपने पिता की तरह आपका खयाल भी रखूँगा। और…. इस तरह प्रभु की कृपा से दो दुरात्माओं को सद्ज्ञान मिला और वे दोनों ही सद् मार्ग पर चल पड़े।